• ट्रम्प को फिर झटका, इस वर्ष का  शांति का नोबेल पुरस्कार भारतीय मूल की नवनीतम नवी पिल्लै को

    नवनीतम नवी पिल्लै रंगभेद के खिलाफ संघर्ष किया और अंतरराष्ट्रीय न्याय व मानवाधिकारों की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई। जानिए उनके जीवन, संघर्ष, रवांडा नरसंहार से जुड़े किस्से..

    ओस्लो/नई दिल्ली, 10 अक्टूबर 2026। भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीका की जानी-मानी न्यायविद और मानवाधिकार विशेषज्ञ नवनीतम ‘नवी’ पिल्लै को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया है।नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने शुक्रवार को इसकी घोषणा की। उन्हें शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के प्रयासों के लिए इस प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा गया है। भारतीय मूल के तमिल परिवार में जन्मीं नवी पिल्लै ने रंगभेद के दौर में भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था में अहम भूमिका निभाई। वे अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) की जज रहीं हैं। उनके नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद ट्रम्प प्रशासन ने आईसीसी पर प्रतिबंध लगा दिए।

    नवी पिल्लै की जिंदगी इस बात की मिसाल है कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने के लिए केवल साहस ही नहीं, बल्कि लंबे संघर्ष और अपने सिद्धांतों पर टिके रहने की जरूरत होती है। उन्होंने अपना करियर ऐसे समय में शुरू किया, जब दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की व्यवस्था के कारण अश्वेत लोगों को बुनियादी अधिकारों और समान अवसरों से वंचित रखा जाता था। उन्होंने कानून को उन लोगों की आवाज बनाने की कोशिश की, जिनकी बात सुनने के लिए व्यवस्था तैयार नहीं थी।

    भारत से क्या कनेक्शन?
    नवी पिल्लई के पिता नारायणसामी नायडू और माता संथामा नायडू थे। वे मूल रूप से भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु से ताल्लुक रखते थे। नवी पिल्लई के दादा-दादी को 1890 के दशक में गन्ने के खेतों में मजदूरी करने के लिए भारत से दक्षिण अफ्रीका ले जाया गया था। नवी पिल्लै के पिता नारायणसामी एक बस ड्राइवर के तौर पर काम करते थे और अपने परिवार का पेट पालने के लिए दूसरे काम (जैसे मछली पकड़ना) भी करते थे।

    रंगभेद के खिलाफ लड़ाई से शुरू हुआ सफर
    नवी पिल्लै का जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुआ था। उनका परिवार भारत के तमिल मूल का था। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दौर में पली-बढ़ीं पिल्लै ने कानून की पढ़ाई की और 1967 में वकालत शुरू की। वह नटाल प्रांत में अपनी स्वतंत्र कानूनी प्रैक्टिस शुरू करने वाली पहली अश्वेत महिला बनीं।

    वकालत के दौरान उन्होंने रंगभेद का विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं और हिरासत में रखे गए लोगों के अधिकारों की पैरवी की। उनका मानना था कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने से उसके बुनियादी अधिकार खत्म नहीं हो जाते। उस दौर में उनके लिए यह लड़ाई केवल कानूनी नहीं, बल्कि समानता और इंसानी गरिमा से भी जुड़ी थी।

    संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकारों की आवाज बनीं
    अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण में काम करने के बाद पिल्लई 2003 में अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय की न्यायाधीश चुनी गईं। वर्ष 2008 में उन्हें संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार उच्चायुक्त नियुक्त किया गया। उन्होंने अगस्त 2014 तक इस पद पर काम किया।

    मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में उनकी जिम्मेदारी दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मानवाधिकारों की स्थिति पर नजर रखना और उल्लंघनों के मामलों को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने उठाना था। इस भूमिका में उन्होंने उन मुद्दों पर भी आवाज उठाई, जिन पर सरकारों और ताकतवर संस्थाओं के साथ मतभेद पैदा हो सकते थे।

    उनकी यात्रा इस बात को रेखांकित करती है कि इंसाफ का सवाल केवल युद्ध या नरसंहार जैसे बड़े अपराधों तक सीमित नहीं है। समाज में महिलाओं के साथ होने वाला भेदभाव, अधिकारों से वंचित करना और उनकी शिकायतों को गंभीरता से न लेना भी समानता की लड़ाई के महत्वपूर्ण पहलू हैं।

    12 दिसंबर   नहीं, 10 दिसंबर को दिया जाएगा पुरस्कार
    नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा 9 अक्टूबर 2026 को की गई है। परंपरा के अनुसार पुरस्कार प्रदान करने का समारोह 10 दिसंबर को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में आयोजित किया जाएगा। इस पुरस्कार के साथ 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर की राशि भी दी जाती है।

    नवी पिल्लै को मिला यह सम्मान उनके लंबे कानूनी और मानवाधिकार संबंधी योगदान को अंतरराष्ट्रीय पहचान देता है। उनकी जिंदगी बताती है कि शांति केवल युद्ध रोकने का नाम नहीं है। नवी पिल्लै को युद्ध अपराध और नरसंहार के दोषियों को सजा दिलाने तथा अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने के प्रयासों के लिए यह सम्मान दिया गया है।