'किसी मृत मतदाता के मामले को छोड़कर, वोटर लिस्ट में एक बार दर्ज किए जा चुके व्यक्ति का नाम, बिना सूचना और सुनवाई के हटाया नहीं जा सकता है'; जस्टिस भुइयां
"चाहे अरबपति हो या रिक्शा चलाने वाला हो। दोनों के वोट की कीमत बराबर होती है। किसी मृत मतदाता के मामले को छोड़कर, वोटर लिस्ट में एक बार दर्ज किए जा चुके व्यक्ति का नाम, बिना सूचना और सुनवाई के हटाया नहीं जा सकता है।" जस्टिस भुइयां ने रविवार को हैदराबाद में NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उक्त बातें कही।
हैदराबाद, 4 अक्टूबर 2026। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने रविवार को हैदराबाद में एक कार्यक्रम में कहा कि देश के नागरिक का वोट देने के अधिकार संविधान की मूल संरचना का अभिन्न हिस्सा है। साथ ही नागरिकों के मताधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से मनमानी होगी और यह संविधान के आर्टिकल 14 और 326 का उल्लंघन होगी।
लाइव लॉ के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने 19वीं एनएएलएसएआर जस्टिस बीआर साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता 2026 में समापन भाषण देने के दौरान यह बातें कहीं।
वोटिंग का अधिकार संवैधानिक अधिकार का हिस्सा- जस्टिस उज्जवल भुइयां
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि वोटिंग का अधिकार केवल वैधानिक अधिकार नहीं बल्कि आर्टिकल 326 में मिले संवैधानिक अधिकार का हिस्सा है, जो वयस्क मताधिकार के आधार पर लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों की गारंटी देता है।
उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि सविंधान में नागरिकों के दो वर्ग नहीं है- एक वे जिन्हें मतदान का अधिकार है और दूसरे वे जिन्हें मतदान का अधिकार नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि कोई भी ऐसी प्रक्रिया जिसके कारण लाखों लोगों को मतदान से वंचित किया जाता है, जिससे वे अपने देश में दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाते, संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
ऐसी प्रक्रिया मनमानी है- जस्टिस उज्जवल भुइयां
उन्होंने कहा, “अगर किसी प्रक्रिया के कारण लाखों लोगों को वोटिंग से वंचित कर दिया जाता है और उन्हें अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया जाता है यानी उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं दिया जाता तो ऐसी प्रक्रिया मनमानी है। किसी भी तरह की दलील इसे उचित नहीं ठहरा सकती। यह संविधान के मूल सिद्धांतों पर हमला है और मैं कहूंगा कि भारतीय संविधान के तहत अपनाई गई व्यवस्था का उल्लंघन है।"
लोकतंत्र में सर्वोच्च पद नागरिक का
जस्टिस भुइयां ने कहा, भारतीय नागरिकों का मतदान का अधिकार, विदेशी शासन के खिलाफ भारत के लंबे संघर्ष से जुड़ा हुआ है। यह हमारी आजादी की अभिव्यक्ति है। अनुच्छेद 326 में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं किया जा सकता।
अमेरिकी जज जस्टिस फेलिक्स फ्रैंकफर्टर की टिप्पणी का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सर्वोच्च पद नागरिक का होता है। मतदान के अधिकार के बिना एक नागरिक की कीमत ही क्या है।
कोई भी कोर्ट एक्सेप्ट नहीं कर सकती- जस्टिस भुइयां
उन्होंने इस बात भी जोर दिया कि कोई भी कोर्ट ऐसी प्रक्रिया को एक्सेप्ट नहीं कर सकती जो लोगों के मताधिकार की संवैधानिक गारंटी को कमजोर बनाती हो।
जस्टिस भुइंया ने यह भी माना कि सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में यह माना है कि मतदान का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में दिए गए फैसले के मुताबिक , मतदान का अधिकार निश्चित रूप से संवैधानिक अधिकार है और यह आर्टिकल 326 के दायरे में आता है।
सोमवार को होगी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने और उनके उन फैसलों को चुनौती देने की मांग की याचिकाओं पर सुनवाई करेगा, याचिका में कहा गया कि ज्ञानेश कुमार ने कथित तौर पर अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए थे। याचिकाओं में आयोग की सामूहिक मंजूरी के बिना किए गए कथित फैसलों, दिशानिर्देशों और सॉफ़्टवेयर में बदलावों को भी अनधिकृत घोषित करने की मांग की गई है।
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